भागलपुर: अंगिका भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए 'संकल्प संगीत संध्या' का आयोजन
भागलपुर के होटल भावना में 'संकल्प संगीत संध्या' का आयोजन किया गया, जहां अंगिका भाषा और संस्कृति को बचाने का संकल्प लिया गया।

बिहार के भागलपुर में अपनी क्षेत्रीय पहचान और विरासत को सहेजने की एक खास कोशिश की गई। शहर के होटल भावना में 'संकल्प संगीत संध्या' का आयोजन हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य अंगिका भाषा, उसके साहित्य और समृद्ध संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना था। इस मौके पर साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों ने दीप जलाकर अंगिका की पहचान को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया।
युगचेतना फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में न केवल भाषा पर चर्चा हुई, बल्कि उन लेखकों और भाषा प्रेमियों को भी याद किया गया, जिन्होंने अंगिका के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। फाउंडेशन के निदेशक शिवनंदन खेतान ने इस बात पर जोर दिया कि अंगिका सिर्फ बातचीत का जरिया नहीं है, बल्कि यह अंग क्षेत्र की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और पहचान है। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा और सामूहिक प्रयासों से ही इस विरासत को आगे बढ़ाया जा सकता है।
साहित्यिक रचनाओं का विमोचन और लोक संगीत की गूंज
कार्यक्रम के दौरान अंगिका साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लेखिका आभा पुरवे की दो महत्वपूर्ण पुस्तकें रिलीज की गईं। इनमें एक लघु उपन्यास 'वरसी' और बच्चों के एकांकी नाटकों का संग्रह 'वंदे मातरम' शामिल है। इन किताबों का उद्देश्य बच्चों और युवाओं में अंगिका साहित्य के प्रति रुचि जगाना है।
शाम की रौनक तब और बढ़ गई जब लोक गायिका अर्पिता चौधरी ने पारंपरिक अंगिका गीतों की प्रस्तुति दी, जिसने सभी को अपनी जड़ों से जोड़ दिया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लटंत ने किया। इस अवसर पर डॉ. डीपी सिंह, फाउंडेशन समन्वयक डॉ. शंभु दयाल खेतान, प्रकाश चंद्र गुप्ता, मनोज मीता, सचिव रवि कुमार, सरोज यादव, अंकित सराफ और चंद झुंझुनवाला समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
इसके अलावा अंशु सिंह, राम रतन चुड़ीवाला, डॉ. अमरेंद्र, कमल जायसवाल, डॉ. सत्यनारायण मंडल, मनोज पंडित, मो. शहबाज, भानु उधान, मनोज कुमार मिश्रा, सुबोध मंडल और त्रिलोकीनाथ दिवाकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। फाउंडेशन ने स्पष्ट किया कि अंगिका के विकास के लिए निरंतर साहित्यिक गतिविधियां, लोक गीतों का दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है।