भागलपुर दुर्गा पूजा की अनूठी परंपरा में बदलाव, कोलकाता से आ रही पवित्र माटी

MyBhagalpur Team13 October 20262 min read0 viewsCity Local
भागलपुर दुर्गा पूजा की अनूठी परंपरा में बदलाव, कोलकाता से आ रही पवित्र माटी

भागलपुर में इस साल दुर्गा पूजा की पुरानी परंपरा में एक बड़ा बदलाव आया है। अब मूर्तियों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली पुण्य माटी यानी पवित्र मिट्टी पारंपरिक मंसूरगंज की जगह कोलकाता के सोनागाछी से मंगाई जा रही है। पहले इस रस्म के तहत पुजारी, पूजा समिति के सदस्य और मूर्तिकार मंसूरगंज जाते थे और वहां सेक्स वर्करों के घरों से ceremoniously मिट्टी मांगते थे। सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने वाली यह प्रथा शहर की कई पूजा समितियों के लिए एक खास विरासत थी। सेंट्रल दुर्गा पूजा समिति के संरक्षक कमल जायसवाल ने बताया कि मंसूरगंज के स्वरूप में बदलाव के कारण भले ही मिट्टी लाने की जगह बदल गई है, लेकिन सोनागाछी से जुड़कर सामाजिक समावेश की भावना को अब भी कायम रखा जा रहा है। शहर में शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ हो चुकी है और तैयारियां जोरों पर हैं। 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर लिए हैं। जिला मजिस्ट्रेट अलंकृता पांडेय और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार यादव ने 7 और 8 अक्टूबर 2026 को शांति समिति की बैठकों की अध्यक्षता की और मेलों तथा पंडालों में सीसीटीवी कैमरे लगाने और पुलिस बल तैनात करने के निर्देश दिए। दमकल विभाग भी लगातार जांच कर रहा है और आयोजकों के लिए पानी का भंडारण तथा आग बुझाने के यंत्र रखना अनिवार्य किया गया है। अधिकारियों ने रात 10 बजे के बाद डीजे के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों को भी दोहराया है।

त्योहार की मुख्य तारीखें और तैयारियां

उत्सव पूरे हफ्ते जारी रहने की उम्मीद है और पंडालों के पट 17 अक्टूबर को खुलेंगे। महा अष्टमी और संधि पूजा 19 अक्टूबर को होगी, इसके बाद 20 अक्टूबर को महानवमी और कन्या पूजन होगा, और 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। खास तैयारियों में मुंडीचक पंडाल को काशी विश्वनाथ मंदिर के रूप में बनाया जा रहा है, और मूर्तियां बनाने के लिए पश्चिम बंगाल से कई मूर्तिकार आए हैं। इसके अलावा, भागलपुर के कुछ इलाकों में मुगल काल यानी अकबर के समय से चली आ रही 18 दिनों तक दुर्गा पूजा मनाने की अनूठी परंपरा आज भी कायम है।

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