भागलपुर के निचले इलाकों में गंगा नदी के भीषण कटाव ने इस वक्त तबाही मचा रखी है। नदी की तेज धार और लगातार हो रहे भू-कटाव के कारण स्थानीय लोगों के बीच भारी दहशत का माहौल है।
प्रमुख बातें:
- पिछले 72 घंटों में कई मकान गंगा नदी में विलीन हुए।
- लोग खुद अपने हाथों से अपने घर तोड़ने को मजबूर हैं।
- प्रशासन के खिलाफ ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।
- सैकड़ों परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं।
पिछले 72 घंटों के भीतर मंदरोनी, इंग्लिश फरका और माशारू गांवों में दर्जनों मकान ताश के पत्तों की तरह ढहकर गंगा नदी में विलीन हो चुके हैं। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि जो घर अभी बचे हुए हैं, उन्हें बचाने के लिए लोग खुद ही हथौड़ा उठाकर अपने सपनों के आशियाने को तोड़ने पर मजबूर हैं, ताकि मलबे और कीमती सामान को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा सके। प्रभावित गांवों से आ रही तस्वीरें बेहद भयावह हैं। कहीं पक्के मकानों की दीवारें भरभराकर नदी की तेज धार में समा रही हैं, तो कहीं लोग बेबसी से अपनी जीवनभर की कमाई को अपनी आंखों के सामने उजड़ता देख रहे हैं। बेघर हो चुकीं महिलाओं की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पेट काटकर, तिनका-तिनका जोड़कर यह घर बनाए थे, लेकिन गंगा की विनाशकारी लहरें सब कुछ लील रही हैं।
इस भीषण आपदा के बीच स्थानीय पुरुषों और युवाओं में जिला प्रशासन और बाढ़ नियंत्रण विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का आरोप है कि कटाव की भयावहता को देखते हुए प्रशासन द्वारा समय रहते कोई ठोस या प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। बाढ़ निरोधक कार्य केवल कागजों पर या खानापूर्ति तक सीमित रह गए, जिसके कारण आज स्थिति बेकाबू हो चुकी है।
कटाव की रफ्तार जिस तेजी से बढ़ रही है, उसने आसपास के अन्य रिहायशी इलाकों की चिंता भी बढ़ा दी है। अगर जलस्तर में कमी नहीं आई और कटाव को रोकने के लिए तुरंत बड़े पैमाने पर जियो बैग्स या बोल्डर क्रेटिंग का काम शुरू नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में कई और गांव पूरी तरह से गंगा में समा जाएंगे। फिलहाल, सैकड़ों परिवार अपने मवेशियों और बचे-खुचे घरेलू सामान के साथ ऊंचे स्थानों, स्कूलों और राष्ट्रीय राजमार्गों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं, जहां वे तिरपाल तानकर खुले आसमान के नीचे रात गुजार रहे हैं।