भागलपुर में लैंगिक समता संवाद: पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ बेटियों की जंग को मिला समर्थन

MyBhagalpur Team4 October 20263 min read0 viewsCity Local
भागलपुर में लैंगिक समता संवाद: पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ बेटियों की जंग को मिला समर्थन

भागलपुर में परिधि संस्था की ओर से कला केंद्र में लैंगिक समता संवाद का आयोजन किया गया जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के ऐतिहासिक प्रतिरोध मार्च और उनके नारों पर चर्चा हुई।

  • दिल्ली प्रोटेस्ट की छात्राओं के प्रति वक्ताओं ने एकजुटता जाहिर की।
  • पितृसत्तात्मक संस्कृति और मर्दवादी सोच पर वक्ताओं ने खुलकर प्रहार किया।
  • नाबालिग लड़की की घटना के विरोध में लगे नारों को क्रांतिकारी बताया गया।

समाज की वास्तविक स्थिति और मर्दवादी सोच

भागलपुर, 04 अक्टूबर (हि.स.)। परिधि संस्था द्वारा कला केंद्र में रविवार को 'लैंगिक समता संवाद' का आयोजन किया गया। इस संवाद के केंद्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा किया गया ऐतिहासिक प्रतिरोध मार्च और उसमें गूंजे नारे रहे। कार्यक्रम में वक्ताओं ने खुलकर पितृसत्तात्मक संस्कृति पर प्रहार किया और दिल्ली प्रोटेस्ट की छात्राओं के प्रति एकजुटता जाहिर की। बैठक का संचालन करते हुए उदय ने समाज की वास्तविक स्थिति को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, हमारा समाज एक मर्दवादी समाज है, जहाँ पितृसत्तात्मकता संस्कृति, समाज और व्यवहार में कदम-कदम पर दिखाई देती है। कोई भी परिवर्तनवादी जो समाज को आगे बढ़ते देखना चाहता है, वह इस दमनकारी व्यवस्था को न तो नकार सकता है और न ही इस पर लीपापोती कर सकता है। उन्होंने नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना के विरोध में दिल्ली में लगे नारों—“दो कचौड़ी एक समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा”, “एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय-हाय” और “शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में”—को मौजूदा दौर के क्रांतिकारी नारे बताया।
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महिलाओं पर हिंसा और पितृसत्तात्मक व्यवस्था

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुषमा ने दिल्ली में प्रदर्शन कर रही बेटियों के साथ मजबूती से खड़े होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा सदियों से गढ़ी गई व्यवस्था का नतीजा है। समाज महिलाओं को मात्र एक यंत्र समझता है, इसीलिए कभी कपड़ों तो कभी संस्कारों के नाम पर उन्हें घरों में कैद करने की कोशिश होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गलती महिलाओं के कपड़ों या आचरण में नहीं, बल्कि पुरुषों की सोच और दिमाग में है।

मर्दवादी सोच और व्यवस्था का विरोध

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए गौतम कुमार ने 'सभी मर्द बुरे नहीं होते' वाले तर्कों को संदर्भहीन बताया। उन्होंने कहा कि इन नारों को किसी एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी मर्दवादी सोच और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ देखा जाना चाहिए। जिस तरह ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद अलग हैं, वैसे ही एक पुरुष का आचरण और पुरुषवादी समाज का आचरण दो अलग चीजें हैं। उन्होंने उन लोगों को प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी बताया जो इन नारों के जवाब में पिता-भाई के रिश्तों की आड़ लेकर स्टेटस को (यथास्थिति) बनाए रखना चाहते हैं। बिनय कुमार भारती ने कहा कि उत्तर भारत के समाज को धर्म पोषित करता है और दुनिया का कोई भी धर्म महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि धर्म और संस्कृति की दुहाई देकर महिलाओं को घर के अंदर कैद रखने की वकालत की जाती है।

मानसिक रूप से स्त्री-पुरुष की बराबरी जरूरी

वहीं सार्थक भरत ने महिला हिंसा की मुख्य वजह स्त्री विरोधी सोच को बताया और कहा कि जब तक महिलाओं को आगे नहीं लाया जाएगा, समाज अधूरा रहेगा। गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र के संजय कुमार ने कहा कि जब तक समाज में मानसिक रूप से स्त्री-पुरुष की बराबरी स्वीकार नहीं होगी, तब तक महिला हिंसा पर लगाम नहीं लगाई जा सकती। लक्ष्मी कुमारी ने आज की माताओं के दर्द को साझा करते हुए कहा कि आज महिलाएं बेटा-बेटी को बराबर पाल रही हैं, उन्हें पढ़ाना चाहती हैं, लेकिन बेटियों को बाहर भेजने में डरती हैं। इस डर को खत्म करने के लिए अब घरों के अंदर बेटों को एक बेहतर और संवेदनशील मनुष्य बनाने की शिक्षा देने की सख्त जरूरत है। हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर

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