भागलपुर में बाढ़ के पानी में डूबी कतरनी धान की फसल, किसानों पर टूटा दुखों का पहाड़

MyBhagalpur Team15 September 20263 min read18 viewsSad/Bad
भागलपुर में बाढ़ के पानी में डूबी कतरनी धान की फसल, किसानों पर टूटा दुखों का पहाड़

भागलपुर के खेतों में फैला पानी और हरियाली भले ही सुंदर लगे, लेकिन इसके पीछे किसानों की महीनों की मेहनत बर्बाद होने का खतरा है। भागलपुर की वैश्विक पहचान से जुड़ी, जीआई टैग प्राप्त खुशबूदार कतरनी धान की फसल इस समय जलजमाव और बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूबी हुई है। भागलपुर, बांका और मुंगेर जिले के लगभग 2099 एकड़ खेतों में लगी कतरनी धान की फसल दस दिनों से बाढ़ के पानी में डूबी है। कतरनी धान अपनी विशिष्ट खुशबू और स्वाद के लिए जानी जाती है, जिससे इस संकट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों ने मांग की है कि प्रशासन जल्द जल निकासी करे और सही आकलन कर उचित मुआवजा दे।

जीआई टैग प्राप्त कतरनी धान पर संकट

भागलपुर, 15 सितंबर (हि.स.)। दूर से देखने पर खेतों में फैला पानी और उसके बीच झलकती हरियाली का दृश्य भले ही बेहद खूबसूरत और मनमोहक नजर आता हो, लेकिन इस तस्वीर के पीछे किसानों की बड़ी चिंता और उनकी महीनों की मेहनत के बर्बाद होने का खतरा छिपा हुआ है। भागलपुर की वैश्विक पहचान से जुड़ी, जीआई टैग प्राप्त खुशबूदार कतरनी धान की फसल इस समय जलजमाव और बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूबी हुई है। ऊपर से कड़क धूप की मार भी बदस्तूर जारी है, जिससे पानी के जल्द उतरने की संभावना बेहद क्षीण नजर आ रही है। स्थिति को देखकर किसानों के चेहरे मुरझा गए हैं।

दस दिनों से पानी में डूबी है फसल

जानकारी के अनुसार, भागलपुर, बांका और मुंगेर जिले के विभिन्न इलाकों में लगभग 2099 एकड़ खेतों में लगी कतरनी धान की फसल पिछले दस दिनों से बाढ़ के पानी में डूबी पड़ी है। लगातार पानी में डूबे रहने के कारण फसल के पूरी तरह सड़ने और खराब होने की आशंका बढ़ती जा रही है। कतरनी धान सामान्य धान की फसल से अलग अपनी विशिष्ट खुशबू, स्वाद और गुणवत्ता के लिए देश-दुनिया में पहचानी जाती है। ऐसे में इस फसल पर आया संकट केवल किसानों की आर्थिक चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र की कृषि पहचान और कतरनी की विरासत से भी जुड़ा हुआ है।

किसानों की मेहनत और चिंता

किसानों का कहना है कि इतने दिनों का लगातार जलजमाव धान की फसल को पूरी तरह जला (सड़ा) देगा। किसानों ने कतरनी धान की खेती में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर भारी लागत और महीनों की कड़ी मेहनत लगाई है। खेतों में लंबे समय से पानी जमा रहने के कारण पौधों पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा है। किसानों ने एक और बड़ी विडंबना की ओर इशारा करते हुए कहा कि ऐसी आपदाओं के बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि को अक्सर फर्जी किसान हड़प लेते हैं, जिससे वास्तविक पीड़ित किसानों तक मदद नहीं पहुंच पाती।

प्रशासन से मुआवजे की मांग

भागलपुर और आसपास के इलाके की विशेष मिट्टी, जलवायु और पारंपरिक कृषि पद्धतियां ही कतरनी के उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती हैं, जिसके कारण इसे वैश्विक स्तर पर जीआई टैग मिला है। खेतों से पानी जल्द नहीं निकलने की स्थिति में यह फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। खेती पर निर्भर रहने वाले इन परिवारों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा इसी कतरनी धान से आता है। ऐसे में फसल खराब होने का सीधा असर उनके घरेलू बजट और अगले कृषि चक्र की तैयारियों पर पड़ना तय है। किसानों ने प्रशासन से जल निकासी की व्यवस्था करने और वास्तविक नुकसान का सही आकलन कर उचित मुआवजा देने की मांग की है।

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