भागलपुर के बुनकरों ने फिर शुरू की अस्सी के दशक की मशहूर कंथा स्टिच कला

MyBhagalpur Team24 September 20261 min read3 viewsBusiness
भागलपुर के बुनकरों ने फिर शुरू की अस्सी के दशक की मशहूर कंथा स्टिच कला

भागलपुर, जिसे सिल्क सिटी के नाम से जाना जाता है, में पारंपरिक कला फिर से जिंदा हो रही है। स्थानीय बुनकरों ने 1980 के दशक की मशहूर 'कंथा स्टिच' कला का काम फिर से शुरू कर दिया है।

  • बिहार, पश्चिम बंगाल और विदेशों में बढ़ी मांग
  • खादी कॉटन और टस्सर सिल्क पर हो रहा है काम
  • स्थानीय महिलाओं को मिल रहा है रोजगार

कंथा स्टिच की खासियत

यह पारंपरिक सुई-धागे का हाथ का काम है। अब्दुल्ला ओवैसी ने बताया कि यह जटिल काम अभी खादी कॉटन और टस्सर सिल्क कपड़ों पर किया जा रहा है। इन साड़ियों की खास बात यह है कि खादी कॉटन बेस होने के कारण ये गर्मी और सर्दी दोनों के लिए आरामदायक होती हैं। इस कला के फिर से आने से स्थानीय महिलाओं को बहुत रोजगार मिल रहा है।

बनने में लगता है चार से पांच दिन

एक साड़ी को बनाने की प्रक्रिया बहुत लंबी है और इसमें चार से पांच दिन की कड़ी मेहनत लगती है। पहले कच्चा धागे से करघे पर साड़ी बुनी जाती है, फिर हाथ से कंथा कढ़ाई की जाती है। अंत में साड़ी को रंगा जाता है और फिनिशिंग की जाती है। हाथ के काम की मेहनत के कारण हर साड़ी की कीमत 3,500 से 4,000 रुपये के बीच है। पश्चिम बंगाल के बाजारों में इस हस्तशिल्प की बहुत एडवांस बुकिंग हो रही है। इसके अलावा, हरतालिका तीज के लिए भागलपुरी सिल्क साड़ियां ट्रेंड में हैं और नए कलेक्शन की शुरुआती कीमत 1,500 रुपये है।

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