भागलपुर: 100 रुपये की दिहाड़ी वाली महिला बनीं सफल उद्यमी, अब दूसरों को दे रही हैं रोजगार
100 रुपये दिहाड़ी से शुरू हुआ सफर अब लाखों के टर्नओवर तक पहुंचा। जानिए ललिता देवी की प्रेरणादायक कहानी।

बिहार के भागलपुर जिले की ललिता देवी ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और अभाव की बेड़ियाँ तोड़कर कामयाबी हासिल की जा सकती है। भागलपुर के जीचो इलाके की रहने वाली ललिता देवी, जो कभी महज 100 रुपये की दिहाड़ी पर दूसरों के घरों में काम करती थीं, आज एक सफल बिजनेस वुमन के रूप में पहचानी जा रही हैं। भागलपुर महिला उद्यमी ललिता देवी की यह कहानी संघर्ष, साहस और आत्मनिर्भरता की एक मिसाल है।
ललिता देवी का सफर आसान नहीं था। एक समय ऐसा था जब वह सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक कड़ी मेहनत करती थीं, लेकिन महीने भर की कमाई सिर्फ 3,000 रुपये होती थी। घर में बेरोजगार पति और पांच बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। हालात इतने बदतर थे कि परिवार को अक्सर यह चुनना पड़ता था कि आज दाल खरीदी जाए या सब्जी। लेकिन ललिता ने हार नहीं मानी और अपनी किस्मत बदलने का फैसला किया।
जीविका समूह और सरकारी मदद से बदली जिंदगी
ललिता की जिंदगी में बदलाव तब आया जब वह 'जीविका' समूह से जुड़ीं। उन्होंने समूह से 20,000 रुपये का ऋण लिया और घर पर ही अचार, पापड़, सत्तू और बेसन बनाने का काम शुरू किया। उनके उत्पादों की गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि भागलपुर की स्थानीय दुकानों में इसकी मांग बढ़ने लगी। इसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के जरिए करीब 1.7 लाख रुपये की वित्तीय सहायता मिली, जिससे उन्होंने उत्पादन के लिए मशीनें खरीदीं और अपने काम को बड़े स्तर पर ले गईं।
समाज की आलोचनाओं और चुनौतियों के बावजूद ललिता अपने लक्ष्य पर टिकी रहीं। आज वह हर महीने 15,000 से 20,000 रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वह अब केवल खुद आत्मनिर्भर नहीं हैं, बल्कि 5 से 10 महिलाओं को नियमित रोजगार दे रही हैं। साथ ही, उन्होंने अब तक लगभग 100 महिलाओं को खाद्य उत्पाद बनाने का व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया है।
ललिता देवी का सपना अब सिर्फ भागलपुर तक सीमित नहीं है। वह अपने ब्रांड को पटना और दिल्ली जैसे बड़े शहरों और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक ले जाना चाहती हैं। उनका लक्ष्य एक बड़ी फैक्ट्री स्थापित करना है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़ी महिलाओं को सहारा मिल सके और वे भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।