भागलपुर के इशीपुर में 157 साल पुराने काली मंदिर की अनोखी परंपराएं

भागलपुर के इशीपुर में स्थित 157 साल पुराने काली मंदिर की अनोखी कहानी और दिवाली की परंपराओं के बारे में जानें।

Talat Praveen6 November 20262 min read0 viewsCity Local
भागलपुर के इशीपुर में 157 साल पुराने काली मंदिर की अनोखी परंपराएं

बिहार के भागलपुर जिले के पीरपैंती ब्लॉक में स्थित इशीपुर गांव का माँ काली मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और इतिहास का एक अद्भुत संगम है। इशीपुर काली मंदिर भागलपुर की यह परंपरा पिछले 157 वर्षों से अटूट चली आ रही है, जिसकी शुरुआत एक पिता की मन्नत और श्रद्धा से हुई थी।

स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण करीब 157 साल पहले जादु राय नाम के एक व्यापारी ने करवाया था। कहा जाता है कि जादु राय की कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद उन्होंने माँ काली की कठोर प्रार्थना की। उनकी मन्नत पूरी हुई और उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने 'कालू राय' रखा। अपनी इस खुशी और कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया और यहाँ पूजा-अर्चना के साथ स्थानीय मेले की शुरुआत की।

समय के साथ यह परंपरा जादु राय और कालू राय के बाद उनके परिवार के सदस्यों, जिनमें আত্মারाम लाठ और श्याम सुंदर लाठ शामिल थे, और गांव वालों द्वारा आगे बढ़ाई गई। साल 2014 में मंदिर का बड़ा जीर्णोद्धार किया गया, जिससे इसका स्वरूप और भी भव्य हो गया। मंदिर के ऊपरी हिस्से में माँ विसहारी, लक्ष्मी, शिव-पार्वती, सरस्वती, गणेश और नंदी की प्रतिमाएं विराजमान हैं, जबकि निचले हिस्से में बजरंगबली की मूर्ति भक्तों के आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

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दिवाली पर सजता है आस्था का मेला

इशीपुर के इस मंदिर की सबसे खास बात यहाँ की दिवाली परंपरा है। साल 1939 में स्थापित 'श्यामा नाट्य समिति' हर साल दिवाली की रात माँ काली की प्रतिमा स्थापित करती है और विशेष अनुष्ठान करती है। इस मौके पर तीन दिनों तक नाटकों का मंचन होता है, भव्य जागरण का आयोजन किया जाता है और जनजातीय नृत्य प्रतियोगिताएं होती हैं, जिससे पूरा इलाका उत्सव के रंग में डूब जाता है।

श्रद्धा का यह सिलसिला केवल गांव तक सीमित नहीं है। कोलकाता में व्यापार करने वाले स्वर्गीय আত্মারाम और श्याम सुंदर लाठ के वंशज—जैसे शिवरतन लाठ टिल्लू, पटेल, संजय, रामानंद लाठ और नवीन—आज भी इस परंपरा से जुड़े हैं। जब माँ काली की विसर्जन पालकी उनके दरवाजे पर पहुँचती है, तो ये लोग आतिशबाजी करते हैं और मिठाइयों व 'टिकरी' का वितरण कर अपनी खुशी मनाते हैं।

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