जमुई: दिवाली से पहले कुम्हारों की बढ़ी चिंता, मिट्टी के दीयों की मांग में भारी गिरावट
जमुई के कुम्हारों के लिए दिवाली फीकी पड़ रही है। इलेक्ट्रिक लाइट्स और प्लास्टिक खिलौनों ने पारंपरिक कला को हाशिए पर धकेल दिया है।

दीपावली का त्योहार रोशनी और खुशियों का प्रतीक होता है, लेकिन बिहार के जमुई जिले के चंद्रमंडीह इलाके के कुम्हारों के लिए यह समय मायूसी लेकर आया है। कभी घर-घर की रौनक बढ़ाने वाले मिट्टी के दीयों की मांग अब इतनी कम हो गई है कि पारंपरिक कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। आधुनिकता की चकाचौंध ने सदियों पुरानी इस कला को लगभग खत्म कर दिया है।
स्थानीय कुम्हारों का कहना है कि अब लोग मिट्टी के दीयों की जगह रंग-बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइट्स, फैंसी बल्ब और मोमबत्तियों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इस बदलाव का असर इतना गहरा है कि कई कारीगरों ने अपने पूर्वजों के इस पेशे को छोड़कर दूसरे कामों की तलाश शुरू कर दी है। पहले जहां दिवाली के समय करीब 40 हजार दीयों की बिक्री होती थी, वहीं अब यह घटकर महज 5 हजार के आसपास रह गई है।
बदलती पसंद और बढ़ती लागत ने तोड़ी कमर
कारीगरों के मुताबिक, समस्या सिर्फ मांग की कमी नहीं है, बल्कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतें भी एक बड़ी वजह हैं। अब दीये बनाने में लगने वाली मेहनत और सामग्री की लागत इतनी बढ़ गई है कि उन्हें बेचने पर मिलने वाला मुनाफा बहुत कम हो गया है। पहले मिट्टी के बर्तन, जग और प्याले जैसे सामानों की भारी मांग रहती थी, जिससे परिवार का गुजारा आसानी से हो जाता था, लेकिन अब यह हुनर विलुप्त होने की कगार पर है।
सिर्फ दीये ही नहीं, बल्कि मिट्टी के खिलौनों का बाजार भी पूरी तरह ढह चुका है। स्थानीय कारीगर अनिल पंडित बताते हैं कि पहले मेलों में मिट्टी के रंगीन खिलौने खूब बिकते थे, लेकिन अब बच्चे प्लास्टिक के खिलौने, जैसे खिलौना मोबाइल, बंदूक, कार और हवाई जहाज की मांग करते हैं।
इस संकट को देखते हुए स्थानीय समाजसेवियों ने आम जनता से अपील की है कि वे इस दिवाली केवल मिट्टी के दीयों का ही उपयोग करें। उनका कहना है कि पारंपरिक दीये जलाना न केवल लक्ष्मी पूजा की परंपरा का हिस्सा है, बल्कि ऐसा करके हम उन गरीब कारीगरों के घरों में भी रोशनी फैला सकते हैं जो अपनी कला को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।