भागलपुर के अकबरनगर स्थित खेरहीया मां दुर्गा मंदिर भक्तों की आस्था का एक बड़ा केंद्र बन गया है, जिसकी शुरुआत 34 साल पहले हुई थी। इस खबर की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं: - मंदिर का इतिहास 1992 में शुरू हुआ था जब एक पुजारी को मां दुर्गा का दिव्य स्वप्न आया था। - ज्योतिषी प्रसाद सिंह और तरणी झा ने एक खुली जमीन पर कुश का त्रिशूल स्थापित कर वैदिक पद्धति से पूजा शुरू की थी। - साल 2011 में मंदिर के लिए पक्के भवन का निर्माण किया गया था।
झा परिवार ने मंदिर की पूजा परंपरा को बनाए रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पंडित शिवशंकर Jha ने लगभग दो दशकों तक अनुष्ठान किए। उनके निधन के बाद,
ब्रह्मचारी रमाकांत सिंह पिछले सात वर्षों से मंदिर की व्यवस्था और पूजा-पाठ संभाल रहे हैं। इससे पहले, उनके पिता तरणी झा इस स्थान पर धार्मिक सेवाएं देते थे। तरणी झा वैदिक क्षेत्र में स्वर्ण पदक विजेता थे, और उनके द्वारा लिखित नवदुर्गा पर ग्रंथ आज भी सुरक्षित है, जो ग्रामीणों के लिए पूर्वजों की भक्ति की विरासत बना हुआ है।
खेरहीया दुर्गा मंदिर की एक खास विशेषता यह है कि यहां पूरी तरह से सात्विक और वैदिक अनुष्ठान किए जाते हैं, और
पशु बलि पर पूरी तरह प्रतिबंध है। भक्त देवी को 'दलिया' चढ़ाने की परंपरा का पालन करते हैं। नवरात्रि के दौरान, सुबह-सुबह ही मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। नवमी और दशमी के दिनों में, पूरा खेरहीया गांव भक्ति में डूब जाता है और यहां आसपास के साथ-साथ दूर-दराज के इलाकों से भी तीर्थयात्री आते हैं।