भागलपुर के मोतीचक में गाड़ियों की जगह हर घर में क्यों है नाव?

भागलपुर के सुलतानगंज ब्लॉक के मोतीचक गांव के लोग वाहनों से ज्यादा नाव रखने को जरूरी मानते हैं। जहां आधुनिक घरों में साइकिल या मोटरसाइकिल होती है, वहीं मोतीचक एक ऐसा अपवाद है जहां ऐसे वाहन बहुत कम, केवल दो या तीन घरों में मिलते हैं। इसके बजाय, लगभग हर घर में अपनी नाव होती है। गांवों में हर साल आने वाली भयंकर बाढ़ के कारण यह गांव एक टापु जैसा बन जाता है, मुख्य सड़कें डूब जाती हैं और पूरा इलाका कट जाता है। इसलिए मवेशियों के लिए चारा लाना, बच्चों को स्कूल ले जाना और मेडिकल इमरजेंसी जैसे जरूरी कामों के लिए नाव ही आने-जाने का मुख्य साधन बन जाती है। नावों के बिना गांव में रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह रुक जाती है। बाढ़ के मौसम की इस स्थिति को डरावना बताया गया है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों दोनों को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि हाल ही में गंगा नदी के जलस्तर में कुछ कमी आई है जिससे थोड़ी राहत मिली है, लेकिन गांव अभी भी पानी से घिरा हुआ है। इन सालाना परेशानियों से निपटने के लिए ग्रामीण खुद अपनी नाव बनाते हैं। वे दो तरह की नाव बनाते हैं: टिन की नाव और लकड़ी की डोंगी नाव। टिन की नाव बनाने में लगभग 7,000 से 8,000 रुपये का खर्च आता है, जबकि लकड़ी की डोंगी नाव के लिए लगभग 60,000 रुपये का खर्च आता है। निवासियों का कहना है कि हालांकि सूखे के मौसम में पैदल चलना मुमकिन है, लेकिन बाढ़ के पानी में आने-जाने की जरूरत के कारण साइकिल या दूसरे वाहन खरीदने से ज्यादा नाव रखना उनकी पहली प्राथमिकता है।