नाथनगर और चंपानगर में बाढ़ से डूबे लूम, बुनकरों की रोजी-रोटी पर संकट

MyBhagalpur Team8 September 20262 min read24 viewsBusiness
नाथनगर और चंपानगर में बाढ़ से डूबे लूम, बुनकरों की रोजी-रोटी पर संकट

भागलपुर जिले में गंगा नदी के बढ़ते जलस्तर ने विकराल रूप धारण कर लिया है, जिससे भारी तबाही का मंजर देखने को मिल रहा है। सिल्क सिटी के नाम से मशहूर भागलपुर के प्रमुख बुनकर क्षेत्र नाथनगर और चंपानगर पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। बाढ़ का पानी अब स्थानीय सिल्क उद्योग की रीढ़ कहे जाने वाले लूम में घुस गया है, जिससे क्षेत्र का कपड़ा व्यवसाय पूरी तरह ठप हो गया है। इस आपदा ने हजारों बुनकर परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

  • नाथनगर और चंपानगर क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न
  • लूम में पानी घुसने से कपड़ा व्यवसाय ठप
  • हजारों बुनकरों के सामने रोजी-रोटी का संकट
  • त्योहारी सीजन के लाखों रुपये के ऑर्डर कैंसिल

मशीनों और सूत को बचाने की जद्दोजहद

बाढ़ का पानी इतनी तेजी से फैला कि लूम घरों में रखी मशीनें डूबने लगी हैं। पानी बिजली की मोटरों तक पहुंच जाने के कारण बुनकर आनन-फानन में मोटरों को खोलकर ऊंचाई पर सुरक्षित रख रहे हैं। इसके साथ ही महंगे सूत को भी भीगने से बचाने के लिए ऊपर किया जा रहा है। लूम बंद होने के कारण आगामी त्योहारों के सीजन के लिए मिले लाखों रुपये के ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए हैं, जिससे कारोबारियों और बुनकरों को भारी आर्थिक चपत लगी है।

हजारों लोग प्रभावित, घरों को छोड़ने को मजबूर

अल्पसंख्यक कल्याण विकास परिषद के प्रधान सचिव डॉ. अनवारूल हक अंसारी ने बताया कि चंपानगर का मस्जिद लेन, बोरिंग बाड़ी, मदनीनगर और गली नंबर 1, 2, 3, 4 व 5 पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। इस इलाके के लगभग 5,000 लोग बाढ़ की विभीषिका से सीधे प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के डर और असुविधा के कारण लोग अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों और रिश्तेदारों के यहाँ शिफ्ट होने को मजबूर हैं। डॉ. अंसारी ने आगे बताया, सामने दुर्गा पूजा और अन्य बड़े त्योहार हैं। केवल इसी क्षेत्र में लगभग 20 से 25 लाख रुपये के ऑर्डर मिले थे, जिन्हें अब मजबूरन कैंसिल करना पड़ रहा है। बुनकरों को उम्मीद थी कि इस त्योहारी सीजन में अच्छी कमाई से परिवार का हाथ मजबूत होगा, लेकिन बाढ़ ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

बुनकरों का दर्द और भविष्य की चिंता

स्थानीय बुनकरों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, दिनभर लूम चलाने के बाद हमें 400 से 500 रुपये की मजदूरी मिलती है, जिससे रोज का चूल्हा जलता है। अब सब बंद है। प्रशासन या सरकार की तरफ से हमें कोई सुविधा या राहत नहीं मिल पा रही है। यह पानी करीब डेढ़ से दो महीने तक जमा रहता है। इस दौरान हम अपनी वही जमा पूंजी खाकर दिन काटते हैं, जो किसी ने घर बनाने या बेटी के ब्याह के लिए रखी थी। बुनकरों ने कहा कि जब जमा पूंजी खत्म हो जाएगी, तो पेट पालने के लिए उन्हें कर्ज के दलदल में उतरना पड़ेगा, क्योंकि इसके अलावा उनके पास जीवनयापन का दूसरा साधन नहीं है।

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