राघोपुर में गंगा का भीषण कटाव बना त्रासदी, उजड़ रहे हैं आशियाने

MyBhagalpur Team4 September 20262 min read27 viewsSad/Bad
राघोपुर में गंगा का भीषण कटाव बना त्रासदी, उजड़ रहे हैं आशियाने

भागलपुर के राघोपुर क्षेत्र में गंगा नदी का भीषण कटाव अब इस दशक की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गया है। नदी की उग्र लहरें उपजाऊ जमीन और बस्तियों को लील रही हैं। बहत्तरा, नन्हकार, छोटी अलालपुर और शंकरपुर जैसे गांवों का भूगोल बदलने की कगार पर है। सैकड़ों परिवारों के सिर से छत छिन चुकी है और लोग शरणार्थी बनने को मजबूर हैं।

  • राघोपुर क्षेत्र में गंगा नदी का भीषण कटाव और मानवीय त्रासदी।
  • बहत्तरा, नन्हकार, छोटी अलालपुर और शंकरपुर गांव प्रभावित।
  • सैकड़ों परिवार बेघर और विस्थापित होने को मजबूर।
  • प्रशासनिक उपेक्षा और राहत न मिलने से ग्रामीणों में आक्रोश।

घरों को खुद तोड़ने को मजबूर लोग

इस विस्थापन का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि पीड़ितों को संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा है। जो घर सालों की मेहनत से बने थे, लोग आज उन्हें अपने ही हाथों से तोड़ने को मजबूर हैं। कोई रोते हुए छतों से खपड़े और टिन की चादरें उतार रहा है, तो कोई दीवारों से चौखट-किवाड़ उखाड़ रहा है। दिन हो या रात, लोग चैन की सांस नहीं ले पा रहे हैं। ट्रैक्टरों और बैलगाड़ियों पर अपनी जमा-पूंजी, बर्तन, कपड़े और अनाज लादकर लोग सुरक्षित ठिकाने की तलाश में निकल पड़े हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कटाव घरों के मुहाने तक आ गया है।
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प्रशासनिक प्रताड़ना और सड़क पर शरण

बेघर हुए गरीब परिवारों के पास सिर छुपाने की जगह नहीं है। जब वे बेबसी में सड़क के किनारे तिरपाल तानकर जान बचा रहे हैं, तो वहां भी उन्हें राहत की जगह प्रताड़ना मिल रही है। पीड़ितों का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन उनकी सुध लेने और पुनर्वास की व्यवस्था करने के बजाय, सड़क किनारे से भी सामान हटाने का दबाव बना रहा है। बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के प्रशासनिक रुख विस्थापितों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।

मवेशियों और आजीविका का संकट

राघोपुर की आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है। पशुपालकों के सामने मवेशियों को बचाने का सबसे गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खुद के रहने का ठिकाना नहीं है, ऐसे में इन बेजुबान जानवरों को कहां ले जाएं और चारे का इंतजाम कहां से करें, यह सवाल हर पशुपालक को परेशान कर रहा है। लोग औने-पौने दाम पर अपने मवेशी बेचने को मजबूर हैं।

ऐतिहासिक धरोहर का नदी में विलीन होना

इस तबाही ने लोगों के घर ही नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को भी जख्म दिया है। शंकरपुर का करीब 100 साल पुराना ऐतिहासिक चैती दुर्गा मंदिर गंगा की तेज धार में विलीन हो गया। दशकों पुराने इस सामाजिक और धार्मिक धरोहर के जमींदोज होने से ग्रामीणों की आत्मा कांप उठी है। बुजुर्गों की आंखें नम हैं और युवाओं में आक्रोश है। बाढ़ और कटाव के इस दोहरे दंश से राघोपुर दहशत में है और लोगों के पास पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

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