सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिरासत के 24 घंटे गिरफ्तारी नहीं, बल्कि डिटेंशन के समय से गिने जाएंगे
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत के 24 घंटे गिरफ्तारी नहीं, बल्कि हिरासत में लिए जाने के समय से गिने जाएंगे।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने मानवाधिकारों के संरक्षण और पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लिया जाता है, तो उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समय सीमा उस वक्त से शुरू हो जाएगी जब उसकी आजादी पहली बार रोकी गई थी, न कि उस समय से जब उसकी औपचारिक गिरफ्तारी (Formal Arrest) दर्ज की गई।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि हिरासत में हिंसा आज भी देश की एक दुखद सच्चाई है और यह मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन है। अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले 24 घंटे से अधिक समय तक रखा जाता है, तो उसे तुरंत रिहा करना होगा। इस समय सीमा की गणना में केवल उस समय को घटाया जा सकता है, जो गिरफ्तारी की जगह से कोर्ट तक पहुँचने के सफर में लगा हो।
मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी और पुलिस पर सख्ती
अदालत ने इस फैसले के जरिए ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के पुराने फैसलों को खारिज कर दिया, जो इस मामले में अलग राय रखते थे। अब नए नियमों के तहत मजिस्ट्रेट की यह जिम्मेदारी होगी कि वह रिकॉर्ड करे कि व्यक्ति की आजादी वास्तव में किस तारीख और समय पर रोकी गई थी और यह जांच करे कि क्या 24 घंटे की समय सीमा का पालन किया गया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1979-80 के भागलपुर ब्लाइंडिंग मामले का जिक्र किया, जहाँ पुलिस ने विचाराधीन कैदियों को अंधा कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे ही हादसों को रोकने के लिए मजिस्ट्रेट की निगरानी जरूरी है। अदालत ने 'डी.के. बसु' मामले के दिशा-निर्देशों को दोहराते हुए 'थर्ड डिग्री' टॉर्चर और अवैध हिरासत को 'लंबी पूछताछ' बताकर छिपाने की कोशिशों पर सख्त नाराजगी जताई।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 के तहत पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि हिरासत की अवधि 24 घंटे की सीमा के भीतर 'उचित समय' से अधिक न हो।