भागलपुर, 21 अगस्त (हि.स.)। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को तंदुरुस्ती और अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले एक गुरुजी को पेट की आग बुझाने के लिए स्कूल के ठीक बाहर झालमुड़ी का ठेला लगाना पड़ रहा है। यह हैरान और भावुक करने वाली तस्वीर भागलपुर जिले के सन्हौला प्रखंड से सामने आई है। यहाँ के अमडंडा मध्य विद्यालय में कार्यरत शारीरिक शिक्षक एवं स्वास्थ्य अनुदेशक निशांत कुमार स्कूल की घंटी बजने के बाद बच्चों को पीटी कराने के बाद स्कूल के बाहर ही झालमुड़ी और स्टेशनरी की दुकान सजाते हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि सरकार से मिलने वाली 16 हजार रुपये की मानदेय राशि में उनके परिवार का गुजारा नहीं हो पा रहा है।
- भागलपुर के सन्हौला प्रखंड के अमडंडा मध्य विद्यालय की घटना
- शारीरिक शिक्षक निशांत कुमार स्कूल के बाहर लगाते हैं झालमुड़ी और स्टेशनरी की दुकान
- महज 16 हजार रुपये मानदेय मिलने के कारण परिवार का नहीं हो पा रहा गुजारा
निशांत कुमार की नियुक्ति वर्ष 2022 में शारीरिक शिक्षक के पद पर हुई थी। उस समय सरकार की ओर से उन्हें महज 8,000 रुपये प्रति माह वेतन मिलता था। करीब तीन साल तक लगातार संघर्ष, आंदोलन और प्रदर्शनों के बाद सरकार ने वेतन बढ़ाकर 16,000 रुपये तो कर दिया, लेकिन आज की कमरतोड़ महंगाई के दौर में यह रकम भी एक परिवार का खर्च चलाने के लिए बेहद कम साबित हो रही है।
निशांत कुमार स्कूल में अपनी करीब दो घंटे की ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। इसके बाद वे स्कूल के बाहर ही दुकान लगा लेते हैं। स्थानीय लोगों और बच्चों की भीड़ उनकी दुकान पर जुटती है, जिससे उन्हें रोजाना 300 से 400 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। निशांत कहते हैं, शुरुआत में अपने ही छात्रों के सामने दुकान लगाने में बहुत शर्मिंदगी और झिझक महसूस होती थी। लेकिन जब परिवार की जरूरतें और बच्चों की भूख सामने खड़ी हो, तो शर्म के मायने बदल जाते हैं। इस पूरे मामले का सबसे भावुक पहलू यह है कि जिन बच्चों को निशांत स्कूल के मैदान में खेलकूद और पीटी सिखाते हैं, वही बच्चे छुट्टी के बाद उनके ठेले पर झालमुड़ी खाने आते हैं।
स्कूल के छात्रों का कहना है कि सर हमें बहुत अच्छी पीटी करवाते हैं और खेल सिखाते हैं। हमें दुख होता है कि हमारे सर को कम वेतन के कारण स्कूल के बाहर दुकान लगानी पड़ती है। निशांत अकेले ऐसे शिक्षक नहीं हैं। उन्होंने बताया कि राज्य के कई शारीरिक शिक्षक आज बेहद दयनीय स्थिति में जी रहे हैं। कोई परिवार पालने के लिए पार्ट-टाइम डिलीवरी बॉय का काम कर रहा है, तो कोई अन्य छोटे-मोटे काम करने को मजबूर है। निशांत की सरकार से मांग है कि उन्हें पूर्णकालिक शिक्षक का दर्जा दिया जाए और सम्मानजनक वेतन वृद्धि की जाए ताकि उन्हें सड़क पर दुकान न लगानी पड़े और वे पूरा ध्यान बच्चों के भविष्य पर लगा सकें। अब बड़ा सवाल यह है कि बिहार के नौनिहालों को स्वस्थ और अनुशासित बनाने की जिम्मेदारी उठाने वाले इन शारीरिक शिक्षकों के दिन कब बहुरेंगे? क्या 16 हजार रुपये में परिवार चलाने की इस कड़वी जमीनी हकीकत पर सरकार का ध्यान जाएगा।