भागलपुर के नौगछिया के तेतरी गांव में स्थित तेतरी दुर्गा मंदिर नवरात्र के दौरान अपनी पुरानी वैष्णव परंपरा को निभा रहा है। साल 1936 से इस मंदिर में पशु बलि पर पूरी तरह रोक है, जो इसकी खास धार्मिक पहचान है। भक्त अपनी मन्नतें पूरी करने के लिए पशु बलि की जगह 'कोहड़ा' यानी कद्दू की बलि चढ़ाते हैं। इस मंदिर का इतिहास 400 साल से भी ज्यादा पुराना है, कुछ लोग इसे करीब 423 से 425 साल पुराना मानते हैं।
मान्यता है कि कलबलिया धारा में एक 'मेध' यानी लकड़ी का लट्ठा बहकर आया था और देवी ने ग्रामीणों को सपने में आकर उसी जगह पर अपनी मूर्ति स्थापित करने को कहा था। मंदिर को दूसरी जगह ले जाने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन इतिहास में इसकी जगह हमेशा वही रही। नवरात्र के पावन अवसर पर यहां दूर-दूर से लाखों भक्तों की भारी भीड़ माता का आशीर्वाद लेने आती है।
इस मौके पर मंदिर परिसर में एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। यह मंदिर अपनी अनोखी मूर्ति विसर्जन प्रक्रिया के लिए भी जाना जाता है, जिसमें भक्त अंतिम संस्कार के लिए माता की मूर्ति को अपने कंधों पर उठाकर ले जाते हैं। हाल ही में क्षेत्रीय स्तर पर हुए विकास के तहत, भागलपुर के आदमपुर चौक पर लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से तेतरी दुर्गा मंदिर का एक नया भव्य रूप बनाने का प्रस्ताव है, जो मूल 423 साल पुराने मंदिर की वास्तुकला और रूप की नकल करेगा।