प्लास्टिक के दौर में उमा देवी ने जिंदा की मिट्टी की कला, भागलपुर में बन रहीं शानदार मूर्तियां
भागलपुर की उमा देवी प्लास्टिक के दौर में मिट्टी की कला को जीवित रख रही हैं। जानिए कैसे यह पारंपरिक हुनर उनके लिए कमाई का जरिया बना।

आज के समय में जहां हर तरफ प्लास्टिक और मशीनों से बनी चीजों का कब्जा है, वहीं भागलपुर के सूर्यगढ़ा ब्लॉक की एक महिला अपनी पारंपरिक कला से सबको हैरान कर रही हैं। अलीनगर पंचायत के खर्रा गांव की निवासी उमा देवी ने मिट्टी की प्राचीन कला को न केवल जीवित रखा है, बल्कि इसे अपनी आजीविका का एक मजबूत आधार भी बनाया है।
उमा देवी अपने हाथों से मिट्टी के सुंदर статуए (मूर्तियां), घड़े, सुराही, दीये और गुल्लक तैयार करती हैं। उनके द्वारा बनाए गए इन उत्पादों की स्थानीय स्तर पर काफी मांग है, जिससे उन्हें एक स्थिर आय मिल रही है। यह सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को बचाने की एक कोशिश है, जिसने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है।
बचपन से जुड़ा है मिट्टी की कला से नाता
मिट्टी के काम में उमा देवी की रुचि बचपन से ही थी। उन्होंने देखा था कि कैसे पुराने समय में शादियों, छठ पूजा, दिवाली और सरस्वती पूजा जैसे बड़े त्योहारों में मिट्टी के बर्तनों और मूर्तियों का कितना महत्व होता था। गांव के बुजुर्गों को मिट्टी से आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस हुनर को सीखा और धीरे-धीरे इसमें महारत हासिल की।
एक समय ऐसा भी आया जब बाजार में प्लास्टिक के बर्तनों और मशीनों से बनी मूर्तियों की भीड़ बढ़ गई, जिससे पारंपरिक मिट्टी के काम की मांग कम होने लगी। इस वजह से उमा देवी की कला कुछ समय तक सिर्फ घर तक ही सीमित रह गई। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी इस कला को एक पेशेवर रूप दिया, जिससे आज वे समाज के लिए एक मिसाल बन गई हैं।