भागलपुर मायागंज अस्पताल में 12 साल की बच्ची के इलाज में आ रही बड़ी मुश्किलें

नगछिया की 12 साल की बच्ची उफक परवीन इस समय भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) में इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (आईटीपी) की बीमारी का इलाज करा रही है। यह एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने ही प्लेटलेट्स को नष्ट कर देती है। इससे उसका शरीर पीला और कमजोर हो जाता है और इस कमी को दूर करने के लिए हर चार महीने में खून और प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सुजीत कुमार झा ने अधिकारियों से सार्वजनिक रूप से अपील की है कि थैलेसीमिया के मरीजों की तरह ही आईटीपी के मरीजों के लिए भी विशेष ब्लड कार्ड जारी किए जाएं। झा ने इस बात पर जोर दिया कि अस्पताल के मौजूदा नियमों के कारण, जिनमें आमतौर पर यूनिट के बदले खून दान करने की शर्त होती है, उफक जैसे गरीब परिवारों पर पैसों और व्यवस्था का बहुत बड़ा बोझ पड़ जाता है।
अधिकारियों का जवाब और अस्पताल के नियम
इस अपील पर जवाब देते हुए, जेएलएनएमसीएच ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. अजय प्रताप ने साफ किया कि सरकारी नियमों में अभी आईटीपी के मरीजों के लिए अलग से ब्लड कार्ड जारी करने का कोई प्रावधान नहीं है। अस्पताल के नियम के अनुसार खून के बदले खून देना जरूरी होता है। हालांकि, डॉ. प्रताप ने यह भी बताया कि उफक की हालत बहुत गंभीर होने के कारण अस्पताल प्रशासन ने तुरंत मदद करते हुए उसे जरूरी खून उपलब्ध कराया है।
भारत में आईटीपी के इलाज में बीमारी की गंभीरता के हिसाब से 2.8 लाख से 19.1 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है, जो एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। जेएलएनएमसीएच में खून की कमी के कारण 18 जून 2026 से खून देने के कड़े नियम लागू हैं, जबकि बिहार स्वास्थ्य विभाग ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए मुख्यमंत्री की सात निश्चय योजना के तहत नौ ब्लॉकों में ब्लड कलेक्शन सेंटर बनाने पर विचार कर रहा है। उफक अपनी मां अर्फीन के साथ डॉक्टरों की देखरेख में है, जबकि समाज के लोग गंभीर और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए सरकारी मदद पर बात कर रहे हैं।