भागलपुर दियारा में बाढ़ के बाद नई जमीन से जगी उम्मीद

MyBhagalpur Team27 October 20262 min read0 viewsBihar
भागलपुर दियारा में बाढ़ के बाद नई जमीन से जगी उम्मीद

गंगा का जलस्तर घटने और नदी के अपनी पुरानी राह पर लौटने के साथ ही जिले के गंगा दियारा क्षेत्रों में एक बिल्कुल नया परिदृश्य उभरने लगा है। बाढ़ की विभीषिका शांत होने के बाद नदी के गर्भ से निकली जमीन पर गाद और सफेद बालू की मोटी परतें साफ देखी जा रही हैं। कई इलाकों में गाद से ढके विशाल मैदान और सफेद रेत के ऊंचे टीले दिखाई दे रहे हैं। चुनौतियों के बीच यह नई जमीन स्थानीय किसानों के लिए सुनहरे भविष्य की उम्मीद बनकर आई है। किसानों को भरोसा है कि गंगबरार यानी नदी की धारा से मुक्त होकर बाहर आई इस उपजाऊ जमीन पर आने वाले दिनों में बंपर पैदावार होगी। अगर मिट्टी की प्रकृति और उसमें मौजूद नमी ने साथ दिया, तो यहां दलहन, मौसमी सब्जियों और नकदी फसलों से किसान अपनी किस्मत बदल सकते हैं।

बाढ़ से हुई थी भारी तबाही

उल्लेखनीय है कि इस साल गंगा के रौद्र रूप ने भागलपुर में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। जिले की 111 पंचायतों, 447 गांवों और 892 वार्डों में बाढ़ ने दस्तक दी थी, जिससे करीब 2,17,168 परिवारों के 9.39 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए। प्रशासन ने करोड़ों रुपये खर्च कर राघोपुर को बचाने के हरसंभव प्रयास किए, लेकिन फिर भी जिले में लगभग 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं।

दियारा क्षेत्र का भूगोल और खेती

भौगोलिक विश्लेषण और जीआईएस रिमोट सेंसिंग आंकड़ों के अनुसार, भागलपुर में कुल दियारा क्षेत्र लगभग 1,073.04 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। मिट्टी की उम्र और बनावट के हिसाब से इसे दो हिस्सों में बांटा गया है। पहला, पुरानी दियारा भूमि जो छह प्रखंडों के 203.26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है। दूसरा, नई दियारा भूमि जो 13 प्रखंडों के विशाल 869.78 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करती है। इस अनूठे भूगोल में किसान पारंपरिक रूप से मौसम और मिट्टी के मिजाज को देखकर खेती करते हैं। इस बार नई जमीन पर कलई, मसूर, मक्का, गेहूं और मूंग जैसी दलहन और अनाज फसलों के साथ-साथ परवल, करेला, कद्दू, ककड़ी और तरबूज जैसी बेलदार सब्जियों की बंपर पैदावार की संभावनाएं दिख रही हैं। वैसे भी भागलपुरी परवल और नवगछिया के केले की धमक देश भर में है।

दबंगों का पुराना डर

हालांकि, इस उम्मीद के पीछे एक पुराना डर भी छिपा है। कलाई की बुआई से लेकर उसकी कटाई के सीजन तक गंगा और कोसी के दियारा इलाकों में दबंगों और अपराधियों का जो खूनी तांडव और वर्चस्व का खेल चलता है, वह प्रशासन और किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि इस नई उपजाऊ जमीन पर कानून का राज रहता है या दबंगई भारी पड़ती है।

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