भागलपुर में शहर का पहला 'बर्ड एटलस' बनाने का ऐतिहासिक काम पूरा होने के करीब है। इसका मकसद पक्षियों की विविधता को दर्ज करना और उनकी रक्षा के लिए रणनीति बनाना है। 4 सितंबर 2026 तक इस प्रोजेक्ट के तहत गंगा किनारे और आसपास के शहरी व तटीय इलाकों में रहने वाली 105 दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों की आधिकारिक पहचान कर ली गई है। बिहार राज्य में किसी शहर की पक्षी आबादी का इतना बड़ा और तकनीकी दस्तावेजीकरण पहली बार किया जा रहा है।
यह प्रोजेक्ट वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) मिलकर चला रहे हैं। विशेषज्ञों की एक टीम ने सबौर कृषि विश्वविद्यालय क्षेत्र से लेकर नाथनगर और चंपानगर तक फैले इलाके में करीब तीन साल तक गहन अध्ययन किया है। इस रिसर्च और संरक्षण में आरसीसीएफ एस. कुमारसामी, कमिश्नर अवनीश कुमार सिंह, डीएफओ आशुतोष राज, पर्यावरणविद् डॉ. डी.एन. चौधरी और डॉ. सुनील कुमार चौधरी शामिल हैं। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पीजी जूलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. चौधरी और मंदार नेचर Club के सदस्यों ने इसमें अहम भूमिका निभाई है।
गंगा और दियारा का इलाका बना आशियाना गंगा, स्थानीय वेटलैंड और दियारा क्षेत्र की हरियाली इस इलाके की सेहत को अच्छा रखती है, जिससे प्रवासी और स्थानीय पक्षियों को रहने की पक्की जगह मिलती है। फरवरी 2026 में हुई एशियाई जल पक्षी गणना के बाद यह दस्तावेजीकरण हुआ है, जिसमें कहलगांव और सुल्तानगंज के बीच 50 से 62 प्रजातियों के 3,000 से ज्यादा पक्षी दर्ज किए गए थे। इनमें संकटग्रस्त इंडियन स्किमर भी शामिल था। इसके अलावा, कदवा दियारा में लोगों की पहल से ग्रेटर एडजुटेंट सारस की संख्या बढ़ी है, जिससे भागलपुर इस पक्षी के दुनिया के केवल तीन प्रजनन स्थलों में से एक बन गया है।
बायोडायवर्सिटी पार्क की तैयारी इलाके की प्रकृति को और मजबूत करने के लिए अधिकारियों ने जुलाई 2026 में गंगा किनारे कम से कम 50 एकड़ में बायोडायवर्सिटी पार्क बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी। यह काम नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल (NGT) के आदेशों के तहत किया जा रहा है। एटलस सर्वे में दर्ज कई प्रजातियां इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में शामिल हैं, जिससे इनकी रक्षा करना बहुत जरूरी हो गया है।