बिहार सरकार ने भागलपुर और बांका जिलों में गन्ने की खेती को फिर से शुरू करने की योजना बनाई है। इसके लिए दोनों जिलों में करीब 100-100 एकड़ जमीन की जरूरत है। पीरपैंती, कहलगांव, सनहाउला और गोराडीह में जमीन का सर्वे किया जा रहा है। इस योजना का मकसद गन्ने की खेती को बढ़ाना, स्थानीय रोजगार देना और किसानों को सुरक्षित बाजार देना है।
भागलपुर के पीरपैंती इलाके में कभी गन्ने की खेती किसानों की आमदनी का मुख्य जरिया थी, लेकिन पिछले तीन दशकों में इसमें भारी गिरावट आई है। किसान जो पहले 8 से 10 एकड़ में खेती करते थे, उन्होंने इसे घटाकर 2 एकड़ से भी कम कर दिया है।
सिंचाई की बढ़ती लागत, सही बाजार भाव न मिलना, गुड़ बेचने में परेशानी और बाढ़ से फसल बर्बाद होना इसके मुख्य कारण हैं। कई किसानों ने बेहतर मुनाफे और कम जोखिम के कारण मक्का, गेहूं, सरसों, मटर और सब्जियों की खेती शुरू कर दी है।
गन्ने की मिल चलाने वाले नजीरुल हक ने बताया कि 30 साल पहले उत्पादन 40 से 50 क्विंटल प्रति एकड़ था, लेकिन सिंचाई के लिए ईंधन के दाम बढ़ने से लागत बहुत बढ़ गई है, जिससे यह फसल फायदे का सौदा नहीं रही। परशुरामपुर के बास्की और बंगाली टोला के मोहम्मद अकबर जैसे स्थानीय किसानों ने बताया कि
स्थानीय चीनी मिलों के न होने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, खासकर तब जब बाढ़ फसल तबाह कर देती है और सरकार से मुआवजा भी नहीं मिलता। मुनेश्वर मंडल जैसे किसानों ने कहा कि सरकारी सब्सिडी न मिलने से उनका इस पारंपरिक खेती से मोहभंग हो गया है।
इस समस्या को दूर करने के लिए कृषि और गन्ना विकास विभाग किसानों को जागरूक करने, बीज उपलब्ध कराने और सरकारी सब्सिडी दिलाने का काम कर रहा है। ब्लॉक कृषि अधिकारी सुमन कुमार ने यह जानकारी दी।
इस पहल का उद्देश्य प्रत्येक जिले में गन्ने की खेती को 500 एकड़ तक बढ़ाना है। इतिहास पर नजर डालें तो 1947 तक बिहार में 33 चीनी मिलें चलती थीं, जो देश के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत हिस्सा देती थीं, लेकिन आज वर्तमान उत्पादन भारत के कुल उत्पादन का 5 प्रतिशत से भी कम है।