मां खड़गेश्वरी काली मंदिर: जेल के कैदियों द्वारा बनाई मालाओं से होती है पूजा, 45 साल पुरानी है यह अनोखी परंपरा
अररिया के मां खड़गेश्वरी काली मंदिर में 45 सालों से जेल के कैदियों द्वारा बनाई गई मालाओं से पूजा की जा रही है। जानें इस अनोखी परंपरा की कहानी।

बिहार के अररिया जिले में स्थित विश्व के सबसे ऊंचे मां खड़गेश्वरी काली मंदिर में आस्था और श्रद्धा की एक ऐसी परंपरा निभाई जा रही है, जो दुनिया में विरल है। यहाँ मां काली की पूजा में इस्तेमाल होने वाली फूलों की मालाएं किसी बाहरी बाजार से नहीं, बल्कि मंडल कारा में बंद विचाराधीन कैदियों द्वारा तैयार की जाती हैं। यह सिलसिला पिछले 45 सालों से बिना रुके जारी है, जो भक्ति और प्रायश्चित का एक अद्भुत संगम पेश करता है।
इस परंपरा की शुरुआत एक दिलचस्प कहानी से जुड़ी है। बताया जाता है कि मंदिर में नियमित पूजा करने वाला एक भक्त किसी कारणवश जेल चला गया था। सलाखों के पीछे होने के बावजूद मां काली के प्रति उसकी श्रद्धा कम नहीं हुई और उसने जेल के अंदर ही फूलों की मालाएं बनाकर मंदिर भेजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह सिलसिला एक परंपरा बन गया। आज भी मंडल कारा के बंदी रोजाना मालाएं बनाते हैं, जिन्हें जेल प्रशासन के सुरक्षाकर्मी मंदिर तक पहुंचाते हैं। मंदिर के साधक नानू बाबा इन्हीं मालाओं से मां की पूजा-अर्चना करते हैं।
152 फीट ऊंचे गुंबद और नानू बाबा की साधना
मां खड्गेश्वरी महाकाली मंदिर का इतिहास और इसकी वास्तुकला भी उतनी ही प्रभावशाली है जितनी इसकी परंपराएं। इस मंदिर की स्थापना साल 1884 में हुई थी, लेकिन इसकी वर्तमान भव्यता स्वामी सरोजानंद जी महाराज उर्फ नानू बाबा की साधना का परिणाम है। उन्होंने 1970 में मंदिर की जिम्मेदारी संभाली, जब यह महज एक टीन की झोपड़ी हुआ करता था।
भक्तों के सहयोग से 1978 में मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1982 में 152 फीट ऊंचा विशाल गुंबद बनकर तैयार हुआ, जो आज श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। नानू बाबा ने न केवल मंदिर का विस्तार किया, बल्कि अपनी निजी संपत्ति का बड़ा हिस्सा समाज सेवा, स्कूल और मस्जिद के निर्माण में भी दान कर दिया। उनकी सर्वधर्म सद्भाव की भावना ऐसी है कि वे अररिया की प्रसिद्ध जामा मस्जिद में भी दंड प्रणाम करने जाते हैं।
काली पूजा के अवसर पर मंदिर को रंग-बिरंगी लाइटों और तोरण द्वारों से भव्य रूप से सजाया जाता है। हर शनिवार और मंगलवार को यहाँ विशेष पूजा और महाभोग का आयोजन होता है, जिसमें खीर, खिचड़ी और पुलाव का भोग लगाया जाता है। इस मंदिर की ख्याति अब केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल और विदेशों से भी श्रद्धालु यहाँ अपनी मुरादें लेकर आते हैं।