मशहूर शिक्षक अवध ओझा ने बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बड़ा सुझाव दिया है। उनका कहना है कि अगर बिहार को विकास के लिए पैसों की जरूरत है तो शराब की बिक्री शुरू करनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही स्कूलों में बच्चों को मेडिटेशन यानी ध्यान सिखाना अनिवार्य कर देना चाहिए। ओझा सर का मानना है कि इससे आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से इतनी मजबूत हो जाएगी कि राज्य में शराब का कोई खरीदार ही नहीं बचेगा।
अवध ओझा ने शराबबंदी पर क्या सुझाव दिया है?
अवध ओझा के अनुसार बिहार को विकास के लिए राजस्व की आवश्यकता है और शराब इसका एक बड़ा स्रोत हो सकती है। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराबबंदी के फैसले की तारीफ भी की क्योंकि इससे महिलाओं और गरीब मजदूरों के परिवारों को काफी राहत मिली है। ओझा का तर्क है कि मजदूर दिनभर पैसा कमाते थे और रात में शराब में उड़ा देते थे जिससे उनके घर बर्बाद हो रहे थे।
हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि अगर शराब फिर से शुरू होती है तो कामकाजी वर्ग फिर से नशे की चपेट में आ सकता है। इसलिए उनका समाधान यह है कि बच्चों को बचपन से ही ध्यान का अभ्यास कराया जाए। जब लोगों के भीतर खुद को नियंत्रित करने की शक्ति आ जाएगी तो शराब की मांग अपने आप खत्म हो जाएगी और नशे की समस्या का स्थायी समाधान निकल जाएगा।
बिहार में शराबबंदी के अब तक के आंकड़े और प्रभाव
बिहार में पूर्ण शराबबंदी 1 अप्रैल 2016 से लागू की गई थी। इसके बाद से अब तक राज्य में कानून को सख्ती से लागू करने के लिए लाखों गिरफ्तारियां और सजाएं हुई हैं। आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 सालों में शराबबंदी कानून के तहत बड़ी संख्या में लोगों पर कार्रवाई हुई है।
| विवरण | आंकड़े (2016-2023) |
|---|---|
| कुल गिरफ्तारियां | 9 लाख से अधिक |
| सजा पाए लोग | 6,40,379 |
| दर्ज मामले | 6.61 लाख से अधिक |
| नीलामी से प्राप्त राजस्व | 4.28 अरब रुपये |
| मृत्युदंड की सजा | 9 लोगों को |
शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब का कारोबार और दूसरे राज्यों से तस्करी एक चुनौती बनी हुई है। शराब न मिलने के कारण युवाओं में सूखे नशे की लत बढ़ने की खबरें भी सामने आ रही हैं। इसके अलावा जहरीली शराब से होने वाली मौतों ने भी प्रशासन की चिंता बढ़ाई है, जिसमें भागलपुर में हुई 70 से अधिक मौतें भी शामिल हैं।






