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राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय ने एक विशेष कलारीपयट्टू कार्यशाला शुरू की है। यह छात्रों को प्राचीन मार्शल आर्ट का अनुभव करने का मौका दे रहा है।
नालंदा विश्वविद्यालय ने राजगीर में एक खास दो हफ्ते की कलारीपयट्टू कार्यशाला शुरू की है। यह छात्रों को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट्स में से एक का अनुभव करने का अवसर दे रहा है।
कलारीपयट्टू, जो केरल से आया है, केवल युद्ध कौशल नहीं है। इसमें शारीरिक प्रशिक्षण, शस्त्रों का अभ्यास, दर्शन, ध्यान और श्वसन व्यायाम शामिल हैं। इसे “सभी मार्शल आर्ट्स की माता” कहा जाता है।
कार्यक्रम का उद्घाटन उपकुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने किया। उन्होंने बताया कि यह कला न केवल लड़ाई का तरीका है, बल्कि यह शरीर और मन को एकजुट करने का एक सम्पूर्ण अभ्यास है।
कार्यशाला में दो प्रसिद्ध शिक्षक, श्री कृष्णदास और श्रीमती काव्या श्री, छात्रों को बुनियादी मुद्राएं, किक्स, हथियार तकनीक और श्वसन अभ्यास सिखाएंगे। इसका उद्देश्य छात्रों की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारना है।
छात्र नियमित सुबह और शाम के सत्रों में भाग लेंगे। यह प्रशिक्षण उन्हें आत्म-रक्षा के अलावा, शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगा।
Summary:
- नालंदा विश्वविद्यालय ने कलारीपयट्टू कार्यशाला शुरू की है।
- यह कार्यशाला छात्रों को प्राचीन मार्शल आर्ट्स का अनुभव देगी।
- उद्घाटन उपकुलपति ने किया और इसके महत्व पर प्रकाश डाला।
- शिक्षक छात्रों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए सिखाएंगे।
- छात्र नियमित सत्रों में भाग लेकर संतुलन और ध्यान सीखेंगे।






