क्या है इस लेख में:

बिहार के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की कहानी और उनके दौर के राजनीतिक हालात का जिक्र है। यह चर्चा आज भी प्रासंगिक है क्योंकि बिहार में मुस्लिम नेताओं को असली शक्ति नहीं मिल रही है।




पटना में राजनैतिक चर्चाएँ फिर से शुरू हो रही हैं, जिसमें बिहार के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की कहानी महत्वपूर्ण है। यह कहानी हमें उनकी ईमानदारी और पिछले दशकों में बदलाव की कमी की याद दिलाती है।


जब बिहार में मुस्लिम नेताओं की बात होती है, तो शहनवाज हुसैन और अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे नाम सामने आते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचा। अब मुकेश सहनी की नियुक्ति पर चर्चा ने यह सवाल दोबारा खड़ा किया है कि क्या मुस्लिम नेता केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए रह गए हैं।


गफूर ने 2 जुलाई 1973 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उनका आगमन साधारण था, कोई धूमधाम नहीं थी। उन्होंने जब पटना में कदम रखा, तो उनके साथ सिर्फ कुछ अखबार थे। उस समय राजनीतिक अव्यवस्था का माहौल था, और गफूर ने इसे संभालने की कोशिश की।


गफूर को उनकी सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। उनके घर के दरवाजे हमेशा आम लोगों के लिए खुले रहते थे। वे अपनी सफेद फिएट कार में बाजार जाते थे और चाचा गफूर के नाम से जाने जाते थे।


गफूर का कार्यकाल जेपी आंदोलन के दौरान कठिनाइयों से भरा रहा। 1974 में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान, उन्होंने कर्फ्यू और पुलिस की कार्रवाई का आदेश दिया, जिसमें कई लोग मारे गए। उनकी कहानी आज भी बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण है और यह सवाल उठाती है कि मुस्लिम नेताओं को असली शक्ति क्यों नहीं मिल रही।





सारांश:

  • बिहार के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की कहानी पर चर्चा।

  • राजनीतिक हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

  • मुस्लिम नेताओं के लिए असली सत्ता का सवाल।

  • गफूर की सादगी और ईमानदारी से भरी पहचान।

  • उनका कार्यकाल जेपी आंदोलन के दौरान चुनौतीपूर्ण रहा।



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