बिहार में अब बेकार फेंके जाने वाले प्लास्टिक कचरे से पक्की सड़कें बनाई जा रही हैं। लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रयोग सफल होने के बाद इसे पूरे बिहार में लागू करने का फैसला लिया है। ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने बताया कि तीन जिलों में इस तकनीक से सड़कें बन चुकी हैं और अब राज्य के सभी 38 जिलों में प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल सड़क बनाने में किया जाएगा।
किन जिलों में बनी है ये खास सड़क?
सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक पूर्णिया, खगड़िया और औरंगाबाद में कुल 10.5 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई गई है। इन सड़कों को बनाने में करीब 8 टन (8000 किलो) सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ है। यह वह प्लास्टिक है जो अक्सर नाले जाम करता था या खेतों में पड़ा रहता था।
आंकड़ों के अनुसार, औरंगाबाद में सबसे ज्यादा 5 किलोमीटर सड़क बनी है जिसमें 3.5 टन प्लास्टिक लगा है। वहीं पूर्णिया में 4.05 किलोमीटर और खगड़िया में 1 किलोमीटर सड़क तैयार की गई है। इस काम में जीविका दीदियों और ग्रामीण विकास विभाग ने मिलकर कचरा जमा करने और उसे प्रोसेस करने का काम किया है।
क्या है फायदा और कैसे बनती है सड़क?
सड़क बनाने के लिए गर्म तारकोल (Bitumen) में 7 से 8 प्रतिशत बारीक कटा हुआ प्लास्टिक मिलाया जाता है। इंजीनियरों का कहना है कि यह तरीका न केवल पर्यावरण के लिए अच्छा है बल्कि इससे पैसे भी बचते हैं। प्रति किलोमीटर सड़क बनाने में करीब 30,000 से 50,000 रुपये की बचत होती है क्योंकि इसमें महंगा डामर कम लगता है।
- मजबूती: प्लास्टिक मिली सड़कें पानी के जमाव को बेहतर झेल सकती हैं।
- टिकाऊपन: सामान्य सड़कों के मुकाबले इनकी उम्र 2-3 साल ज्यादा होती है।
- नियम: प्लास्टिक प्रोसेसिंग यूनिट के 50 किलोमीटर के दायरे में अब सड़क निर्माण में प्लास्टिक का उपयोग जरूरी कर दिया गया है।
आगे की क्या तैयारी है?
ग्रामीण विकास मंत्री ने साफ किया है कि इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद अब पूरे बिहार में इसे फैलाया जाएगा। राज्य भर में 171 प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट काम कर रही हैं जहां घर-घर से लाया गया कचरा प्रोसेस होता है। बिहार बजट 2026 में भी ग्रामीण बुनियादी ढांचे और सात निश्चय-2 के तहत इस तकनीक को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। इससे बाढ़ प्रभावित इलाकों में सड़कें जल्दी खराब नहीं होंगी।






