बिहार के भागलपुर से लेकर झारखंड के साहिबगंज तक गंगा नदी में मछलियों की स्थिति को लेकर एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा किए गए सर्वे में पता चला है कि गंगा में पहले मिलने वाली मछलियों की कई उच्च प्रजातियां अब लुप्त होने की कगार पर हैं। इस बदलाव से न केवल नदी का इकोसिस्टम बिगड़ रहा है, बल्कि हजारों मछुआरों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ा है।
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सर्वे में क्या हुआ खुलासा और कौन सी मछलियां बची हैं?
सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भागलपुर और इसके आसपास के गंगा क्षेत्रों में पहले 114 प्रकार की मछली प्रजातियां पाई जाती थीं, जिनमें से अब 31 प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। विशेषज्ञों ने पाया कि गंगा के तटीय इलाकों में रहने वाली 23 अन्य प्रजातियां भी अब दिखाई नहीं देती हैं। फिलहाल गंगा के इस हिस्से में केवल 14 अच्छी गुणवत्ता वाली प्रजातियां ही बची हैं। विशेषज्ञों ने सर्वे के दौरान 18 प्रमुख प्रजातियों की पहचान की है जिनमें मुख्य रूप से रोहू, कतला, चेंग, पोंटा, गरई, बाम, टेंगरा, झींगा, और बोचवा शामिल हैं।
मछलियों की संख्या कम होने के बड़े कारण क्या हैं?
गंगा में मछलियों की घटती संख्या के पीछे कई प्राकृतिक और इंसानी कारण बताए गए हैं। विदेशी नस्ल की मछलियां जैसे थाई मांगुर और अफ्रीकी कैटफिश स्थानीय मछलियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई हैं।
| मुख्य कारण | प्रभाव और विवरण |
|---|---|
| विदेशी प्रजातियां | थाई मांगुर और सकर माउथ कैटफिश देशी मछलियों को खा रही हैं। |
| प्रदूषण | औद्योगिक कचरा और प्लास्टिक से पानी का ऑक्सीजन लेवल गिर रहा है। |
| बांध और बैराज | फरक्का जैसे बांधों के कारण मछलियों के आने-जाने और प्रजनन में बाधा है। |
| अवैध शिकार | मछलियों के बीजों और छोटी मछलियों का बड़े पैमाने पर शिकार होना। |
| जलवायु परिवर्तन | पानी के तापमान और पीएच मान में लगातार हो रहा बदलाव। |
सरकार और मत्स्य विभाग अब इन प्रजातियों को बचाने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 2017 से 2025 के बीच लाखों की संख्या में स्वदेशी मछली के बीज गंगा में छोड़े गए हैं। भागलपुर के सुल्तानगंज और कहलगांव जैसे इलाकों में भी सजावटी मछली पालन और बीज डालने की योजनाएं चल रही हैं ताकि स्थानीय मछुआरों को फिर से बेहतर रोजगार मिल सके।






