सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रेप की FIR को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई महिला पहले से शादीशुदा है, तो वह किसी दूसरे पुरुष पर ‘शादी का झांसा’ देकर रेप का आरोप नहीं लगा सकती। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि जब महिला खुद कानूनी तौर पर शादी करने के योग्य नहीं थी, तो झूठे वादे का दावा कमजोर हो जाता है।

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क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक 25 वर्षीय छात्र और एक महिला के बीच का है। महिला ने आरोप लगाया था कि शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों की जांच में पाया कि जब यह रिश्ता चल रहा था, उस समय महिला का अपने पहले पति से तलाक नहीं हुआ था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब महिला का तलाक लंबित था, तो वह किसी और से शादी नहीं कर सकती थी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने उसे शादी का झूठा वादा देकर धोखा दिया। इस आधार पर कोर्ट ने निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए छात्र के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज कर दिया।

सहमति से बने रिश्तों पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर वो रिश्ता जो शादी की मंजिल तक नहीं पहुँच पाता, उसे ‘झूठा वादा’ या रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। बेंच ने कहा कि अगर रिश्ता शुरुआत से आपसी सहमति (Consensual) पर आधारित था और बाद में खटास आने पर टूट गया, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा।

जजों ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य और पुलिस तंत्र को दो वयस्कों के निजी जीवन और रिश्तों के विवादों में घुसने से बचना चाहिए। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में संयम बरतने की जरूरत है, खासकर तब जब रिश्ता लंबे समय तक सहमति से चला हो।


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